आव्हान!

आव्हान!


क्या यही है विश्व रीती, क्लेश और घनघोर अनीति ?
नीतियुक्त की गागर रीती, आज बनी है घोर अनीति |

विश्व क्लेश की काली चादर, ओढ़े बैठे हैं सब ज्ञानी 
आज बड़ा प्रासंगिक है, चकित हैं महाविज्ञानी! 

हुआ यूँ की प्रकृति ने किया मानव पर प्रत्याक्रमण
जब मानव की क्रूरता ने , किया उसपर अतिक्रमण |

अतिक्रमण अधिग्रहण से, अहंकार के संक्रमण से 
अब भी समय है, सुन ऐ मानव!
सम्भल जा तू अपने अहम् से |

परिवर्तन है तेरे जीवित दहन से 
या कहूँ कि तेरे आत्मगमन से 
निकल जीवन की इस कृत्रिम मृगतृष्णा उधड़न से , जीवन दे जीवचिंतन से |

यह धरा तेरी नहीं, नभ पर भी ना कोई अधिकार, 
माटी का दूत, तू माटी में मिल जायगा, क्या काम यह अहंकार?

प्राणियों में प्राण हो, जब वायू में हो वेग
दानियों में जो दान हो, अनभिज्ञ हो अविवेक |

आशावादि,
कि यह चादर काली ना रह जायगी
आज ही मेरी कविता ये, मधुपगीत गुनगुनायेगी!

(PC- Tumblr)

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